यहाँ अरावली (Aravali) पर्वतमाला के बारे में सरल व महत्वपूर्ण जानकारी है — उसकी उम्र, फैली हुई सीमा, पर्यावरणीय लाभ, सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) का हालिया फैसला, और सरकार का स्टैंड — सभी को साफ हिन्दी में समझा जाएगा
अरावली क्या है और कब की है?
अरावली पर्वतमाला (Aravalli Range) पृथ्वी की सबसे पुरानी पर्वतमालाओं में से एक है, लगभग 2 अरब (2 billion) साल पुरानी। यह भारत के उत्तर-पश्चिमी हिस्से में स्थित एक प्राचीन भू-आकृतिक संरचना है। �
यह कहाँ तक फैली है?
अरावली पहाड़ियाँ भारत के चार राज्यों में विस्तृत हैं:
- 📍 दिल्ली
- 📍 हरियाणा
- 📍 राजस्थान
- 📍 गुजरात
कुल मिला कर यह पर्वतमाला लगभग 1.4-1.5 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली हुई मानी जाती है। �
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अरावली के पर्यावरणीय लाभ
अरावली पर्वतमाला का भारत के लिए बड़ा प्राकृतिक महत्व है:
🌿 प्राकृतिक भूमिका
- ✅ मरुस्थलीकरण (Desertification) से रक्षा: थार के रेगिस्तान को आगे बढ़ने से रोकती है।
- ✅ जल पुनर्भरण (Groundwater recharge): वर्षा का पानी ज़मीन में जाने में मदद करती है।
- ✅ जल स्रोत: कई नदियाँ और नाले अरावालियों से निकलते हैं।
- ✅ जैव विविधता: वन्यजीवों, पक्षियों और पौधों के लिए निवास स्थान।
- ✅ पर्यावरण संतुलन: धूल-कोलेशन कम करने में मदद, हवा व जल के स्वच्छता में लाभ।
👉 ये सभी कारण बनाते हैं कि अरावली को उत्तर भारत की “ग्रीन बेल्ट” भी कहा जाता है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला दिया?
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) ने अरावली की परिभाषा (definition) से जुड़ा एक बड़ा फैसला किया है:
नई परिभाषा (Nov-Dec 2025):
- ✔️ कोई भी भू-आकार जो अपने आसपास के स्तर से कम से कम 100 मीटर ऊपर उठता है वह अरावली पहाड़ी माना जाएगा।
- ✔️ और दो या अधिक ऐसे पहाड़ियाँ यदि एक-दूसरे से 500 मीटर के भीतर हों तो वे मिलकर “अरावली रेंज” बनाते हैं।
- ✔️ कोर्ट ने कहा कि नए खनन (new mining leases) पर तब तक रोक (moratorium) रहेगी जब तक एक व्यापक प्रबंधन योजना तैयार नहीं हो जाती।
👉 यह परिभाषा अब राजस्थान, हरियाणा, गुजरात और दिल्ली सभी राज्यों में एक समान लागू होगी।
आलोचना और विवाद
नई परिभाषा पर काफी environmentalists, लोगों, नेताओं और विशेषज्ञों की आपत्तियाँ हैं:
❗ दावा किया जा रहा है कि यह 100-मीटर का मापदंड 90% से अधिक अरावली क्षेत्र को कानून की सुरक्षा से बाहर कर देगा क्योंकि वह छोटी-कोटी की पहाड़ियाँ भी पर्यावरण के लिए बेहद जरूरी होती हैं। �
❗ कहा जा रहा है कि इससे न केवल खनन (mining) बल्कि विकास, निर्माण और भूमि उपयोग के तरीकों पर भी असर पड़ेगा।
👉 कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि इससे धरती की जल-तालपट्टी, धूल-मिट्टी-बाँध, वन्यजीव और मौसम में बदलाव हो सकता है |
सरकार का वर्तमान स्टैंड क्या है?
भारत सरकार और पर्यावरण मंत्रालय का कहना है:
- 📌 यह नई परिभाषा अरावल्लियों को कमजोर नहीं करेगी; बल्कि 90% से अधिक इलाके को ही अब “संरक्षित क्षेत्र” (Protected Zone) में रखा गया है।
- 📌 सरकार ने स्पष्ट किया कि 0.19% से भी कम क्षेत्र में खनन की अनुमति दी जा सकती है।
- 📌 उन्होंने कहा कि 100-मीटर नियम का गलत अर्थ ना लगाया जाए, और पूरे जंगल/भूमि को सावधानी से देखा गया है।

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